(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.107. अध्यायः 107
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरम्प्रति भीष्मेण गोदानफलविशेषविषयकेन्द्रप्रश्नानुवादः ॥ 1 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच।

उक्तं ते गोप्रदानं वै नाचिकेतमृषिं प्रति।
माहात्म्यमपि चैवोक्तमुद्देशेन गवां प्रभो॥ 13-107-1(85722)
नृगेण च महद्दुःखमनुभूतं महात्मना।
एकापराधादज्ञानात्पितामह महामते॥ 13-107-2(85723)
द्वारवत्यां यथा चासौ निविशन्त्यां समुद्धृतः।
मोक्षहेतुरभूत्कृष्णस्तदप्यवधृतं मया॥ 13-107-3(85724)
किं त्वस्ति मम संदेहो गवां लोकं प्रति प्रभो।
तत्त्वतः श्रोतुमिच्छामि गोदा यत्र वसन्त्युत॥ 13-107-4(85725)
भीष्म उवाच। 13-107-5x(7112)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
यथाऽपृच्छत्पद्मयोनिमेतदेव शतक्रतुः॥ 13-107-5(85726)
शक्र उवाच। 13-107-6x(7113)
स्वर्लोकवासिनां लक्ष्मीमभिभूय स्वयाऽर्चिषा।
गोलोकवासिनः पश्ये वदतां संशयोऽत्र मे॥ 13-107-6(85727)
कीदृशा भगवँल्लोका गवां तद्बूहि मेऽनघ।
यानावसन्ति दातार एतदिच्छामि वेदितुम्॥ 13-107-7(85728)
कीदृशाः किंफलाः किंस्वित्परमस्तत्र को गुणः।
कथं च पुरुषास्तत्र गच्छन्ति विगतज्वराः॥ 13-107-8(85729)
कियत्कालं प्रदानस्य दाता च फलमश्नुते।
कथं बहुविधं दानं स्यादल्पमपि वा कथम्॥ 13-107-9(85730)
बह्वीनां कीदृशं दानमल्पानां वाऽपि दीदृशम्।
अदत्त्वा गोप्रदाः सन्ति केन वा तच्च शंस मे 13-107-10(85731)
कथं वा बहुदाता स्यादल्पदात्रा समः प्रभो।
अल्पप्रदाता बहुदः कथं स्वित्स्यादिहेश्वर॥ 13-107-11(85732)
कीदृशी दक्षिणा चैव गोप्रदाने विशिष्यते।
एतत्तथ्येन भगवन्मम शंसितुमर्हसि॥ ॥ 13-107-12(85733)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्ताधिकशततमोऽध्यायः॥ 107 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-107-2 एकापराधादज्ञानान्नृगस्तां दुर्गतिं गतः। इति ट. ध. पाठः॥


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